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परिवीक्षा अवधि

परिवीक्षा अवधि (प्रोबेशन) नौकरी की वह शुरुआती अवधि है जिसमें नियोक्ता कर्मचारी के काम को परखता है और कर्मचारी भी काम व माहौल को समझता है। अवधि पूरी होने पर सेवा 'कन्फ़र्म' की जाती है — यानी कर्मचारी स्थायी माना जाता है।

भारत में प्रोबेशन कैसे चलता है

भारत में प्रोबेशन की कोई एक केंद्रीय परिभाषा नहीं है — यह मुख्यतः नियुक्ति-पत्र, कंपनी की सेवा-शर्तों और जहाँ लागू हों वहाँ औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946 के स्थायी आदेशों से तय होता है। व्यवहार में अवधि अक्सर तीन से छह महीने रखी जाती है और ज़रूरत पर बढ़ाई जा सकती है, बशर्ते नियुक्ति-पत्र में इसका प्रावधान हो।

  • प्रोबेशन के दौरान नोटिस अवधि आम तौर पर छोटी रखी जाती है — जो भी हो, वह लिखित में स्पष्ट होनी चाहिए।
  • कन्फ़र्मेशन लिखित में देना अच्छी प्रथा है; कई स्थायी आदेशों में अवधि बीतने पर स्वतः कन्फ़र्मेशन माना जाता है।
  • न्यूनतम वेतन, ईपीएफ, ईएसआई और काम के घंटों जैसे कानूनी हक़ पहले दिन से लागू होते हैं — प्रोबेशन उनसे छूट नहीं देता।

शिफ़्ट टीमों के लिए मायने

रेस्तरां और रिटेल जैसे क्षेत्रों में स्टाफ़ बदलता रहता है, इसलिए प्रोबेशन के दौरान नियमित फ़ीडबैक और शिफ़्टों में बराबर मौक़ा देना ज़रूरी है — कन्फ़र्मेशन का फ़ैसला आख़िरी हफ़्ते की जल्दबाज़ी न बने।

नियुक्ति-पत्र / सेवा-शर्तें तथा औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946 (जहाँ लागू) — प्रोबेशन की अवधि और शर्तें इन्हीं से तय होती हैं; वैधानिक हक़ पहले दिन से लागू रहते हैं।

Tommy में नए कर्मचारी की शिफ़्टें और हाज़िरी एक जगह दिखती हैं, जिससे प्रोबेशन ख़त्म होने से पहले उसके काम का साफ़ रिकॉर्ड आपके सामने रहता है।

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