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सैलरी स्लिप (वेतन पर्ची)

सैलरी स्लिप (वेतन पर्ची) वह दस्तावेज़ है जो हर वेतन-अवधि में कर्मचारी को बताता है कि उसने कितना कमाया, क्या-क्या भत्ते मिले और कौन-सी कटौतियाँ हुईं। यह कर्मचारी के लिए आय का प्रमाण है और नियोक्ता के लिए पारदर्शिता का — वेतन को लेकर ज़्यादातर विवाद साफ़ स्लिप से ही टल जाते हैं।

भारत में सैलरी स्लिप में क्या होता है

  • कमाई: मूल वेतन, महंगाई भत्ता (DA), मकान किराया भत्ता (HRA), अन्य भत्ते और ओवरटाइम।
  • कटौतियाँ: ईपीएफ अंशदान, ईएसआई अंशदान (पात्र कर्मचारियों के लिए), व्यावसायिक कर (कुछ राज्यों में) और लागू हो तो TDS।
  • ब्योरा: वेतन-अवधि, काम के दिन, छुट्टियाँ और शुद्ध (नेट) भुगतान।

न्यूनतम मजदूरी नियमों और राज्य के दुकान एवं स्थापना अधिनियमों के तहत नियोक्ता को वेतन रजिस्टर रखना और कई मामलों में वेतन पर्ची देना ज़रूरी है; वेतन संहिता 2019 भी कर्मचारियों को वेतन पर्ची देने की बात कहती है। डिजिटल स्लिप आम तौर पर मान्य है।

नियोक्ता के लिए व्यावहारिक बातें

मूल वेतन और भत्तों का बँटवारा सोच-समझकर करें — ईपीएफ, ग्रेच्युटी और ओवरटाइम की गणनाएँ इसी ढाँचे पर टिकी होती हैं। स्लिप हर बार एक ही प्रारूप में, समय से दें और उसकी प्रति सँभालकर रखें; निरीक्षण या विवाद की स्थिति में यही आपका रिकॉर्ड है।

वेतन भुगतान अधिनियम 1936 / वेतन संहिता 2019 तथा न्यूनतम मजदूरी (केंद्रीय) नियम — वेतन रजिस्टर व वेतन पर्ची संबंधी दायित्व; राज्य के दुकान एवं स्थापना अधिनियम भी लागू होते हैं।

Tommy की टाइम-क्लॉक से दर्ज घंटे सीधे पेरोल रिपोर्ट में जाते हैं, जिससे सैलरी स्लिप बनाते समय काम के दिन और ओवरटाइम के आँकड़े खोजने नहीं पड़ते।

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